18th Feb, 2026
अरण्य सहाय द्वारा निर्देशित ‘ह्यूमन्स इन द लूप’ फिल्म अपने प्राकृतिक दृश्यों में सिनेमेटिक भाषा में फ्रेंच प्रभाववादी कलाकारों क्लाउड मोनेट और पिएर ऑगूस्ट रेनुआर की इम्प्रेशनिस्ट पेंटिंग्स की याद दिलाती है, फिल्म के भावों को और गहरा कर देती है. ऊपर से शांत लगती और धीमी गति से आगे बढ़ती नेहमा की कहानी अपने भीतर कई मुख्यधारा के विमर्शों को गंभीरता से चुनौती देती है. इस कहानी के आइडिया पर एक साक्षात्कार में अरण्य कहते हैं कि एक रेजिडेंसी वर्कशाॅप में अलग-अलग क्षेत्रों के कई लोग जब विचार साझा कर रहे थे तो वहीं वे करिश्मा मेहरोत्रा के लेख ‘ह्यूमन टच’ को पढ़कर चैंक गए थे, वह शोधपरक लेख झारखंड के सुदूर ग्रामीण इलाके में एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) डेटा सेंटर पर लेबलर के तौर पर काम कर रही उन सैकड़ों आदिवासी लड़कियों के श्रम के बारे में बात करता है जो आज की बन रही नई प्रौद्योगिकी की दुनिया को आकार दे रही हैं, ये विषय उन्हें फिल्म के लिए पसंद आता है और वे शोध में जुट जाते हैं. जैसे-जैसे शोध आगे बढ़ता है वो जानने लगते हैं कि कैसे पहली दुनिया के देशों से आने वाला ढेर सारा डेटा एआई को दिए जाने से कई तरह के सांस्कृतिक और औपनिवेशिक पूर्वाग्रह भी पिछली सदी से आने वाली दुनिया में जाने को तैयार हो रहे हैं. पहले उन्हें यह विषय डाॅक्यूमेंट्री के ज्यादा करीब लगा लेकिन बाद में उन्होंने इसे एक कहानी में ढालने का निर्णय लिया.
अरण्य सहाय इसके पहले ‘मिर्गी’, ‘चैत’ और ‘साया’ नाम की तीन शाॅर्ट फिल्म्स और ‘सांग्स फाॅर बाबासाहेब’ नाम से एक डाक्यूमेंट्री बना चुके हैं, जिन्हें सराहा गया है. ‘ह्यूमन्स इन द लूप’ उनकी पहली फीचर फिल्म है.
कहानी एक आदिवासी उरांव समुदाय की स्त्री नेहमा के इर्द-गिर्द बुनी गई है, उसने ढूकु परंपरा (जिसमें लड़का-लड़की विवाह का पारंपरिक तरीका न अपनाकर बस साथ रहने लगते हैं) के तहत एक उच्च जाति (हिंदू) के लड़के रितेश के साथ रहना चुना था, इस साथ से उनकी एक बारह वर्ष की बेटी धानु और डेढ़ बरस का बेटा गुन्टू है. नेहमा डिवोर्स के लिए केस फाइल कर चुकी है और बच्चों के साथ वापस अपने झारखंड के सुदूर इलाके में बसे गांव लौटती है. बच्चों की कस्टडी के लिए उसे नौकरी की जरूरत है. उसे एक परिचित की मदद से गांव के पास ही एआई डेटा लेबलर की जाॅब मिल जाती है. नेहमा की बेटी धानु जिसका अभी तक जीवन शहर रांची में बीता है वो बिना इंटरनेट और सुविधाओं के गांव के जीवन के साथ तालमेल नहीं बैठा पाती है और बात-बात पर वह आदिवासियों के प्रति वैमनस्य से भरी बातें करती रहती है. नेहमा अपनी नई नौकरी, एकल कामकाजी मां के संघर्ष बीच तालमेल बिठाने की कोशिश में लगी है और यहीं उसकी आदिम और सहज प्रतिभा, पश्चिमी औपनिवेशिक पूर्वाग्रह युक्त डेटा से टकराती है.
यह फिल्म दरअसल कई विमर्शों और द्वंद्वों का एक सिनेमैटिक कोलाज है, जहां कभी संवादों में, तो कभी फिल्म की दृश्य भाषा में दो विपरीत धु्रवों का द्वंद्व लगातार बना रहता है. एक तरफ प्रकृति के गहरे नीले, हरे, भूरे, मटमैले रंग इस फिल्म को सादगी, जीवंतता, भावनात्मक गहराई देते हैं, दूसरी तरफ एआई सेंटर की कंप्यूटर स्क्रीन पर चमकते नियाॅन, गहरे गुलाबी रंगों और आकृतियों का काॅन्ट्रास्ट एक नकली और बनावटी दुनिया की उदासीनता और निर्जीवता को उभारता है. एआई डेटा लेबलर के तौर पर नेहमा का आदिम ज्ञान और पश्चिमी देशों से आयातित डेटा के बीच का बायस टकराता है तो दूसरी तरफ दो अलग जड़ों और पृष्ठभूमि से सिंचित पीढ़ी का द्वंद्व भी है. आदिवासी अस्मिता को संरक्षित करने और उसे अगली पीढ़ी को देने की अकुलाहट भी है लेकिन अगली पीढ़ी में उपेक्षा का भाव, विस्थापन का दर्द और पुनर्स्थापित होने की चाह, एकल कामकाजी मां के तौर पर आर्थिक संघर्ष और बच्चों को समय न दे पाने की पीड़ा भी. नेहमा और धानु के बीच का द्वंद्व दरअसल दो अलग दुनियाओं का द्वंद्व जैसा उभरकर आता है, पर इन सबके बीच गहरे तौर पर स्त्री और प्रकृति के परस्पर साहचर्य की संवेदनशील कहानी भी बुनी हुई है जो आखिर तक याद रह जाती है.
फिल्म का पहला दृश्य एक पेंटिंग सरीखा स्क्रीन पर उभरता है जहां बारह- तेरह बरस की नेहमा के चेहरे और विशेषरूप से आंखों का क्लोजअप शाॅट है, वो घास पर लेटी है, उसका चेहरा हरी, लंबी और कोमल घास के बीच कुछ इस तरह से दिखता है, कि लगता है कोई उसे बहुत नजदीक से देख रहा है और वो भी दूसरी तरफ देख रही है. दूसरे शाॅट में एक साही की आंखों का क्लोजअप है वो खड़ा है और वो भी नेहमा को उसी तरह संयत भाव से देख रहा है. ये परस्पर देखना और शांत रहना, एक दूसरे के प्रति विश्वास, सहचर्य और सम्मान को दर्शाते हैं. नेहमा उसे छूने या पकड़ने की कोशिश करती नहीं दिखती. वह आकाश की ओर देखती है, जहां पंछियों का समूह निर्द्वंद्व भाव से उड़ रहा है. उनके कलरव से आकाश गूंज रहा है और फिल्म का नाम स्क्रीन पर उभरता है. फिल्म में आगे यह बात खुलती है कि जंगल का सबसे शर्मिला जीव और हमेशा रक्षात्मक रहने वाला साही नेहमा के साथ घंटों समय बिताता था. यहां साही सिर्फ एक जानवर की तरह उपस्थित नहीं होता बल्कि उसकी एक एजेंसी है, वह निर्णय लेता है कि किस पर भरोसा करना है और किस पर नहीं, ये दृश्य इकोफेमिनिज्म की उस भावना पर जोर देता है कि प्रकृति निष्क्रिय और मौन नहीं है बल्कि साही का नेहमा पर भरोसा दरअसल स्त्री और प्रकृति के उस संवेदन- शील संबंधों की व्याख्या करता है, जहां दमनकारी व्यवस्था द्वारा शोषित होने पर वे नितांत अकेले और भीतर से टूटे होने पर एक-दूसरे के लिए ‘हीलिंग-स्पेस’ बनाते हैं. इसीलिए आगे फिल्म में प्रेम में चुने गए संबंध में घायल हुई नेहमा रह-रहकर साही की स्मृति में डूब जाती है. ये स्त्री का प्रकृति पर लगाव से अधिक भरोसा है. फिल्म में कई दृश्य और संवाद हैं जहां नेहमा अपने बचपन के मित्रा रोशन के साथ जंगल में, गुफा में, कटे हुए धान के खेत के बीच घूमती रहती है. रोशन पूछता है, ‘नेहमा, क्या इन पत्थरों में भी जान होता है?’ नेहमा, ‘हां’. रोशन, ‘क्या इन बादलों में भी जान होता है?’ नेहमा, ‘हां, होता है’. रोशन, ‘क्या कटा हुआ धान में भी जान होता है?’ नेहमा, ‘हां’. रोशन, ‘क्या इन सूखी लकड़ियों में भी जान होता है?’ नेहमा, ‘हां, होता है. मेरे बाबा कहते हैं कि हमारे आसपास जितनी भी चीजें होती हैं, उन सब में जान होती है. अगर पत्थरों में कान लगाकर सुनोगे ना तो उसकी भी धड़कन सुनाई देगी.’ और ये संवाद कहते हुए छोटी लड़की नेहमा के हाथ का मिड क्लोजअप शाॅट में गुफा के पत्थरों को, उसके रंग और टेक्सचर को हल्के हाथों से स्पर्श करते हुए स्क्रीन पर गुजरता है. ये दृश्य इकोफेमिनिज्म की सुंदरतम परिभाषा है.
नेहमा के चरित्र में मां की छवि को एक मेटाफर के रूप में प्रयोग किया गया है, जहां न केवल वह अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए प्रयासरत है बल्कि प्रकृति के प्रति संवेदनशील और रक्षक की भूमिका भी निभाती है. जब एआई लेबलिंग के दौरान उसे पौधे के सड़े पत्तों को खाने वाले जीव को पेस्ट के रूप में लेबल करने का काम दिया गया, तो वह उसे पेस्ट लेबल नहीं करती है क्योंकि वह जानती है कि वो कीट पौधों को नुकसान नहीं पहुंचाता है. यही भाव वो एआई को लेकर अपनाती है. वो उसे एक ऐसे अनगढ़ शिशु की तरह देखती है, जिसे जो सिखाया जाएगा, सीख जाएगा और यहीं ये फिल्म मुख्यधारा के नैरेटिव को कटघरे में खड़ा कर देती है.
पहली दुनिया के देश किस तरह व्यक्ति, समाज, आदिम ज्ञान, तकनीक के साथ-साथ सोचने की पूरी प्रकृति को नियंत्रित करने की कोशिश में लगे हैं, ‘ह्यूमन्स इन द लूप’ फिल्म इस पूरी साजिश से पर्दा हटाने की सहज कोशिश ही नहीं करती बल्कि अपने एक दृश्य में उस पूरे नैरेटिव को सिर के बल खड़ा कर देती है. उस दृश्य की तुलना प्रसिद्ध साइंस फिक्शन फिल्म ‘ब्लेड रनर 2049’ के उस विख्यात दृश्य जिसमें तकनीक द्वारा निर्मित छवि के सामने मनुष्य बने मशीन के द्वंद्व से जूझते नायक को बौना या बहुत छोटा दिखाया गया है से की जा सकती है, जिसके एक दृश्य में नेहमा के चेहरे के क्लोजअप शाॅट के सामने कंप्यूटर स्क्रीन पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रतिनिधि एक छोटे असहाय शिशु की तरह दर्शाया गया है, यह दृश्य तकनीक के सामने मनुष्य की अंतर्दृष्टि, मेधा और जिज्ञासा को विराट तरीके से स्थापित करता है, जो रचियता होने के भाव से युक्त है.
‘ब्लेड रनर 2049’ जैसी फिल्म जिस डिस्टोपियन दुनिया में तकनीक और मनुष्य के संबंधों की दार्शनिक व्याख्या तक जाती है और मनुष्य में अमानवीयता और कृत्रिम तकनीक से बनी मशीन में मानवीयता की तलाश करती है, उस जगह तक पहुंचने से पहले के शुरुआती चरण में तकनीक को कैसे बायस बनाया जा रहा है, उस कोशिश पर ‘ह्यूमन्स इन द लूप’ गंभीर सवाल उठाती है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सामने मनुष्य की आंतरिक प्रज्ञा को स्थापित करता यह दृश्य पूरी फिल्म का मुख्य स्वर बन जाता है.
पिछले तीन दशकों से अधिक समय से यूटोपियन, डिस्टोपियन, सुपर हीरोज और साइंस फिक्शन फिल्मों की एक पूरी खेप ने किस तरह अमेरिकी तकनीक और ज्ञान को दुनिया के रक्षक की भूमिका में स्थापित किया है और उसकी सुपर पावर वाली छवि का महिमा मंडन किया है. यह फिल्म उनके छिपे हुए नैरेटिव को अपने सामान्य से पूछे गए सवाल से बेनकाब कर देती है. एआई के लगातार हर क्षेत्रा में पैर पसारने को लेकर जिस तरह का हौवा अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने पैदा किया है और उसके सामने इंसान को बौना बना देने की साजिश चल रही है, उसके जवाब में एआई को एक विकराल और विराट ताकत की जगह, एक छोटे शिशु के रूप में देखना दरअसल पूरे विमर्श को दूसरे सिरे से पकड़कर उधेड़ देना है. सिर्फ इतना ही नहीं किस तरह भविष्य की तकनीक के जरिए पहली दुनिया के देश तीसरी दुनिया के देशों की सहज प्रज्ञा को खारिज करते रहे हैं और ज्ञान की सीमा और परिभाषा तय करते रहे हैं, यह भी इस फिल्म के जरिए खुलता है. जिसके बारे में उन्हें नहीं पता वो सब निरर्थक और मूल्यहीन है, मूल्य निर्धारण करने की उनकी उस धारणा और प्रक्रिया पर भी यह फिल्म सवाल उठाती है. इतना ही नहीं पश्चिम के सौंदर्य के मानदंड से लेकर पारंपरिक ज्ञान को अर्थहीन बनाने की कोशिश किस तरह तकनीक के जरिए लगातार जारी है ये फिल्म उस पर भी बात करती है. नेहमा की उपस्थिति और चिंता इन कवायदों पर सवालिया निशान लगाती है. नेहमा एक शांत योद्धा की भूमिका में दिखती है, वो हारती नहीं, न तकनीक के पूर्वाग्रह के सामने, ना समाज के सवालों के सामने. उसका खुद पर गहरा यकीन फिल्म के हर उस दृश्य में है, जहां वो मौजूद है. लो एंगल शाॅट और विशेष फोकस लाइट नेहमा के व्यक्तित्व की विराटता और आंतरिक दृढ़ता को दर्शाती है.
तथाकथित मुख्यधारा और आदिवासी अस्मिता के द्वंद्व के रूपक की तरह नेहमा और उसकी बारह-तेरह वर्षीय बेटी धानु के बीच का तनाव भी फिल्म की मुख्यकथा का हिस्सा है. नेहमा का अपनी जड़ों और जंगल से प्रेम और धानु का शहर में गुजरा बचपन, बिना फोन और इंटरनेट के गांव में अचानक आकर रहना मतभेद की मुख्य वजह है, जिसके लिए वह नेहमा को दोषी मानती है. नेहमा के दिल को चोट पहुंचाने के लिए वो बार-बार अपने पिता द्वारा दिए गए आदिवासी समाज के हंडिया पीने और बच्चों को पिलाने का ताना दोहराती रहती है, जिसे सुनकर समझा जा सकता है कि तथाकथित सभ्य समाज का दंभ भरने वाले समाज से आने वाले प्रेमी के रहने पर भी नेहमा ने बरसों तक अपने समाज और समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह भरे ताने सुनते हुए तंग आकर वापस गांव का रुख क्यों किया होगा. बराबरी के संबंधों में जब एक को लगातार उसकी जड़ों को लेकर नीचा दिखाया जाए तो ऐसे संबंधों की परिणति समाप्त हो ही जाती है. दूसरा ढूकु शादी को सामाजिक मान्यता न मिलने के कारण भेदभाव और ताने स्त्री के जिम्मे अधिक आते हैं, जिसका एक रूप नेहमा के गांव लौटने पर उसके आसपास वालों की बातों से पता चलता है, जिस गांव की उम्मीद पर वापस लौटकर आई है, वह गांव सिरे से गायब ही रहता है, यहां तक कि नेहमा का घर गांव की परिधि से बाहर है, मानो उसे गांव वालों ने बेदखल कर रखा हो. लेकिन यही से नेहमा के जीवन में इंसानों से ज्यादा प्रकृति के साथ गहरे रिश्ते की पहचान भी होती है. जंगल को देर तक देखना, शकरकंदी चुनने जाना और अपने बच्चों को वो सीख देने की कोशिश जो उसे अपने पूर्वजों से मिली थीउस ज्ञान को अगली पीढ़ी को देने की अकुलाहट नेहमा के चेहरे पर बार-बार उभरकर आती है. बाद में सरकारी स्कूल में बनी दोस्त मालती के माध्यम से धानु की दोस्ती जंगल से होने लगती है और फिल्म के आखिर तक वो स्त्राी और प्रकृति के उस सहअस्तित्व को थोड़ा-थोड़ा समझने लगती है, जिसे शुरू में वो समझने से इंकार करती रही थी.
इस फिल्म में अभिनय और कलाकारों का चयन कहानी को भरोसेमंद बनाता है. ये लगभग डी सिका, सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक की फिल्मों की तरह गैर पेशेवर और मूल कहानी की पृष्ठभूमि से लिए गए कलाकार हैं, जिनकी उपस्थिति फिल्म को और प्रामाणिक बना देती है. अभिनय की दृष्टि से नेहमा के चरित्रा को निभाने वाली अभिनेत्राी सोनल मधुशंकर ने लगभग सभी तरह के द्वंद्व को पर्दे पर साकार कर दिया है. नेहमा के किरदार की उदासी मिश्रित नाॅस्टेल्जिया और गहरे अकेलेपन को उन्होंने बिना ओवरटोन किए बखूबी उतारा है, वहीं धानु का किरदार निभाने वाली रिधिमा सिंह ने शहरी टीनेजर के गांव के प्रति निस्पृह भाव को बखूबी जीवंत किया है. डेटा लेबलिंग सेंटर की इंचार्ज के तौर पर अलका का किरदार निभाने वाली गीता गुहा और अन्य कलाकार का अभिनय सहज और किरदारों के प्रति आश्वस्त करने वाला है. ये सभी मिलकर फिक्शन को यथार्थ के इतने निकट ले आते हैं कि फिल्म कहीं-कहीं डाॅक्यूमेंट्री का अनुभव देती है.
फिल्म का दृश्य संयोजन, संपादन, ध्वनि संयोजन, तकनीक प्रकृति के द्वंद्वों और विरोधाभासों को और तीव्रता देते हैं. प्रकृति के दृश्यों में एक ठहराव, शांति और धीमी गति है, वहीं एआई सेंटर पर कंप्यूटर स्क्रीन पर चलती छवियों में तीव्रता, गति और कीबोर्ड की ध्वनियां वर्कस्पेस के दबाव को व्यक्त करती हैं. वहीं पार्श्व से आते कुरुख गीतों का प्रयोग कहानी को उस जमीन से जोड़ देता है, जिसकी कहानी कही जा रही है.
फिल्म के रंग संयोजन में भोर, धीरे से जंगल पर उतरती शाम के दृश्य, जो गहरे नीले, धूसर और मटमैले हैं, जंगल का गहरा हरापन पूरी फिल्म को एक भावनात्मक गहराई और उम्मीद देता है. मटमैला और धूसर रंग संयोजन जीवन की वास्तविकता, अकृत्रिमता, सादगी, भीतर से घायल लेकिन आत्मचिंतन का स्वर उभारता है. विशेष रूप से नेहमा का उतरती सांझ और उगते भोर को देखने का दृश्य. मोनिका तिवारी और हर्षित सैनी की सिनेमैटोग्राफी न केवल फिल्म के वातावरण को जीवंत करती है बल्कि उन दृश्यों के रंग संयोजन ने कहानी को और गहराई प्रदान की है. खासकर पत्थर की धड़कन सुनने का क्लोजअप शाॅट, जो फिल्म के मध्य में एक सवाल की तरह और आखिर में एक जवाब की तरह स्क्रीन पर आता है. यह फिल्म अपने क्राफ्ट में ऊपर से शांत बहती ऐसी नदी है जिसमें हमारे समय की जरूरी चिंताओं का आर्तनाद भी है.
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